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शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

क्यों कहते हो......!





 



जानती  हूँ मैं....
न मुझमें लिबास का सलीका 
न कुछ कहने  की तहजीब 
न ही समझूँ मैं मन तुम्हारे 
क्यों कहते हो पहाडिन.....?

पर फिर भी 
वो निरीह पशु-झुण्ड 
रूक जाते हैं मेरी एक धाद से 
उस  जंगल के लता  वृक्ष
खिल  उठते हैं मेरी आहट से

वो पहाड़ों  की दीवारें गूँज
उठती  हैं मेरी अनुगूंज से 
चांदनी  ही बन  जाती  है  साथी 
जब उलझ जाती  हूँ कभी 
इन सुरम्य घाटियों में

बस  मन बोल  उठता  है 
हाँ .... हूँ मै पहाडिन ....!!!
[धाद-पुकारना ]   

 


सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

शुभ दीपावली



                                                    रोशन  हो हर कोना,रोशन हो हर क्षण 
                                 समृद्धि,सौहादर्य का हो सार-विस्तार..
                                   कुछ दीये ले आओ,देखो कुछ है मेरे पास
                                     चलो दीप जला आयें द्वार-द्वार...!!!
                                                    



















शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

कशमकश ....


 मैंने अपने सुख दुःख के दो
तलों से पूछा ..
क्या  मैंने अपने से बेवफाई की 
एक ने कहा-हाँ
तुमने उस ठंडे पानी  को
गर्म राख से झुलसाया है
तूने मेरी परवाह न कर
उसको   सताया है .
उसकी झंकारों को मोड़कर 
उसके रूप को बदलाया है...

तो दुसरे तल ने कहा- नहीं 
उसने भी तेरा ख्याल न कर
जिल्लत की हर  नजर में तुझे झोंका है
सानिध्य का हर तार तोडा है 
तूने ठीक किया मेरे रूप 
तूने ठीक किया
अजीब उलझन है 
क्या किसने कहा ?
किसे अपनाऊ कही सुख के बहाने 
दुःख का अम्बार न लग जाए .......||
 


सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

VYATHA.......05january2003

 नम आँखों से कोई आगे दिखा 
तो कोई पीछे थामे हुए उसे 
पुकारने को विवश कर दे 
विवशता में दबती हुई
भावनाओं में घुटती हुई..


हर किसी को एक ही मुस्कान से 
अपना परिचय देती हुई 
बस ख़ामोशी से सहती रही 
वो पीड़ा, वो दर्द 
जो किसी को विवश कर दे 
रोने को, चीखने को,चिल्लाने को....
हर तरफ से बंधे-बंधे 
कुछ पर्वतों से घिरे उस  राह पर
जाने के लिए वो तैयार थी
पर तैयार न थे
उसके साथी,समय, हालत.... 

बस दबी जुबान से 
चुनौती देने को तैयार थी 
और समय अपनी रफ़्तार का
एक हिस्सा भी उसे न दे सका.....

मैं क्या दू उसे ,मैं स्वयं व्यस्त हूँ
जीने में अपनी परिस्थियाँ संभालने में
तुम थोडा वक्त निकालो 
साथ दो उसका
तभी जान पाओगे उसकी व्यथा....      

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

Meri pahli kavita. 02/04/2002 at Srinagar Garhwal Uttarakhand

मृत्यु  की छाया निकट है 
मोह की माया विकट  है 
मोह त्याग स्वीकार कर लो 
मनुष्य जिसे कहता है मृत्यु ..

अथक चाल भरकर तुम 
अडिग वेग  लेकर तुम 
ले चलो उस और 
मनुष्य जिधर जाने से डरता..


आत्मा की चीत्कार सुन
 स्वार्थ का ताना न बुन 
 तोड़ दे अवरोध सारे   
 बने  है जो तुम्हें सोचकर...


निज तन, निज धन के लिए
निज ज्ञान,अपमान के लिए
न विलम्ब कर क्षण भर का 
सोच कर उनका क्या होगा...


वे मुर्ख ऐसे न,जैसे तुम
वे ज्ञानी ऐसे,जैसे न तुम
करें सब कुछ समझ कर
जांचकर,और कुछ परखकर..

ये प्रण कर लो मन में
चल पड़े हम जिस ओर 
न कोई बाधक बने
न जाने,न समझे...


              वो ही है एक शांतिदायक 
               मनुष्य जिसे कहता है मृत्यु.....!!!!!