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रविवार, 29 जनवरी 2012

इस बहाने

आज उत्तराखंड में चुनावी दिन है.और पलायन यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है .इसी बहाने ना जाने मेरे मन में ये पंक्तियाँ आ रही हैं जिन्हें मैं आपके साथ साझा कर रही हूँ ....


''इस चौखट पर हलचल होगी
ये दरवाजे चरमराएंगे आज
क्यूँ मन मेरा खुश होता है 
कि तुम आओगे इस बार..

मैं तो पदचिन्ह पर ही 
पैर रख पाती हूँ
उस गिने चुने रास्ते पर 
ही धीमे धीमे चला करती हूँ..

ये घास उखड़ेगी आँगन की
ये ताले खुलेंगे मन के
गाँव में त्यौहार होगा शायद
इस बार वोट के बहाने..

पर ना तीज त्यौहार
ना लोकतंत्र के बस की 
लाख कोशिशें हो जाए पर
ना बदल सका मन तुम्हारा..!! 




 




शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

हल्की सी सिहरन लिए
जी उठता है जब कोई ख्वाब
कुछ कर्कश सा क्या..
सुनाई देता है हर और
और फिर....
छा जाता  है नितांत
गुमसुम सा 
बोलता सन्नाटा....!

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

कुछ टूटा

कुछ टूटा फिर से..
 ना जाने क्या था 
क्या बुना था धीरे-धीरे
मन ने सोच कर तुम्हें
दर्द था,निकल आया
रोके से ना रुका....बस
बहता गया तमाम सिलवटें लिए...!

आये वो कुरेदने
तीखे- तीखे शब्दों से
मन था मेरा संभल गया
टूटना था जिसे जार-जार 
वो टूट गया...!!!!
  

रविवार, 1 जनवरी 2012

पर.

"कुछ अनकही सुनूँ 
कह डालूं सब कुछ 
बिखेर दूं 
लम्हा-लम्हा"
पर 
कितना मुश्किल है 
फिर से ख्वाब सजाना..

भीतर उठा गुबार
थम चुका अब
जीत चुकी मैं 
पर 
कितना मुश्किल है 
अपने अंतर्द्वंद से लड़ना ..!