समर्थक

बुधवार, 5 जून 2013

मैं ही क्यूँ?

कभी उनींदी
कभी जागती
उन ख्वाबो के
सिरहाने में
मैं ही क्यूँ...

कुछ बदलता
कुछ ठहरता
इन मौसमों की
ठिठुरन में
मैं ही क्यूँ..?