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रविवार, 14 जुलाई 2013

मैं और मेरा उत्तराखंड

      उत्तराखंड की त्रासदी किसी से छुपी नहीं है कुछ भी बोलना मुझे स्वयं को भी सहन नहीं होगा।
इस दैवीय आपदा पर कुछ पंक्तिबद्ध करना मेरी आपनी मौत पर जश्न मनाने समान होगा। अभी भी जहाँ मैं रहती हूँ यहाँ अखबार नहीं आया बिना रास्तेे पुल के विद्यालय बंद है।बुनयादी सुविधाए न के बराबर... इंटरनेट है क्यों कि ये बुनियादी सुविधा में नही आता..और हां इतनी ख़ामोशी हैं की खुद की आवाज भी चुभ जाती हैं... और सबसे अजीब बात केदारनाथ में प्रलय की बात 20जून को पता चलीं
क्यों कि उस विपदा में संपर्क खुद तक ही रह पाया।
अंत में यही कहना है  कि श्री केदार धाम ने अपने ही पर्याय वाची शब्द को चरितार्थ किया हैं वो है "जलीय"   या  "दलदल"

बस यही कहूँगी....
""क्या कुछ बिखरा टूटा
    इन पहाड़ो से पूछो
ये आवाज ना दें
तो हम पहाडियों से पूछो""