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सोमवार, 28 अप्रैल 2014

तुझ तक

हाशिये छोड़ ..कतार के आखिर में मै
शोर और संवाद दोनों खत्म मुझतक

हर ओर भीड़..उससे निकलती हंसी
छनी छनी सिर्फ गुनगुनी मुस्कान मुझतक

बेशक आधे अधूरे हैं पर ...कभी तो
कैसे तो पहुंचे शब्द मेरे तुझ तक ...!!ं

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

कुछ पन्ने...

खूबसूरत हैं जिन्दगी
बिलकुल मेरी डायरी सी

शुरूआती  पन्ने
बहुत सुन्दर
तमाम रंग..मेरे हाथों से
तो कुछ बड़ो के सहारों से

फिर
ओह्ह...बेहतरीन चटक रंग
लाल गुलाबी पीले नीले
पर सब एक साथ
शायद ज्यादा हो लिए
वरना काले नही पड़ते...

बाद के कुछ पन्ने
कटे फटे ..
मुड़े भी
उफ़ कुछ तो स्याह
एकदम सख्त ..

ये क्या...??
ये पन्ने फिर खाली
एकदम कोरे
ऐसा क्यूँ???
मैं कहाँ थी???

और कुछ पन्ने
तेरे लिए छोड़े हैं
काश कोई कह दे
कि लिख दो
या लिख दूँ??
कुछ पारदर्शी रंगों
तेरा नाम फिर से ....!!!े