शब्द ने शब्द जोड़े.. शब्द से शब्द बिखरे.. शब्द -शब्द ने ढूंढें अक्षर.. शब्द- शब्द फिर, शब्दश: खामोश हुए..!
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रविवार, 16 मई 2021
क्षणिका
सोमवार, 17 फ़रवरी 2020
कांच के टुकड़े
रविवार, 19 जनवरी 2020
एकल संवाद
बुधवार, 18 दिसंबर 2019
अंतिम
बुधवार, 20 मार्च 2019
Layout
पीछे मुड़कर देखूं जरा तो
जिन्दगी का भी layout
सा कुछ दिखता है
लगता है इस कोने का
उस कोने रख दिया
निकाल शोर से
सन्नाटे में छुपा लिया
ओह्ह ___देखो वहां पर जरा
चटक लाल रंग रह गया
Hmm,____ पीला मुरझाया -सा
(निश्चित थी कि सूखा न था)
पत्ता...!!
हां वही ,__
उसे भी सहेज लिया
पर वो "रिश्ते"
वाला हिस्सा
संवर रहा है अभी भी
बस जरा जरा सा .....!!!
(Asha Bisht )
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019
शनिवार, 9 फ़रवरी 2019
शुक्रवार, 15 सितंबर 2017
तुम और मैं
मैं सिर्फ
हाँ और ना
में गुम
और तुमने
अपने शब्दकोश
के सारे शब्द
उडेल दिये
बोलो___विचित्र
तुम या मैं
मैं तेरे तिलिस्म
में घुलती रही
और तुम
उलझे उलझे
खुद से ही
बोलो___ख्वाब में
तुम या मैं
जानती हूं
ना तुम थे
ना रहोगे
बोलो____सच्चा कौन
तुम या मैं ......!
शनिवार, 9 सितंबर 2017
शनिवार, 17 दिसंबर 2016
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
बात
उफान ,तिलिस्म,
जिद ,अहम
सब अनवरत
फिर
धुआ ....!
मौन , बातें
हंसी ,आँसू
सब मुझसा
फिर
खत्म....!!
सांसे,सन्नाटा
शोर, खामोशी
सब तुझसा
फिर
दर्द ....!!!!
शुक्रवार, 23 सितंबर 2016
शुक्रवार, 26 अगस्त 2016
मेरा प्रश्न
कई
बार
सुना है
एक
शब्द
"संवदेनहीन"
क्या
हर
बात
का
जबाब
देकर
मैं
"संवदेनशील "
बन
जाऊगीं..???
मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016
मौन
हाँ...सुन लिया था
पर
प्रत्युतर मेरा
मौन
शिकायतें लाज़मी थी
पर
तर्पण मेरा
मौन
सन्नाटो को टूटना ही था
पर
अभिव्यक्ति मेरी
मौन
मुखौटे
सारे रंग लिए
पर
आवरण मेरा
मौन ...!
शुक्रवार, 29 जनवरी 2016
रविवार, 4 जनवरी 2015
सोमवार, 28 अप्रैल 2014
तुझ तक
हाशिये छोड़ ..कतार के आखिर में मै
शोर और संवाद दोनों खत्म मुझतक
हर ओर भीड़..उससे निकलती हंसी
छनी छनी सिर्फ गुनगुनी मुस्कान मुझतक
बेशक आधे अधूरे हैं पर ...कभी तो
कैसे तो पहुंचे शब्द मेरे तुझ तक ...!!ं
शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014
कुछ पन्ने...
खूबसूरत हैं जिन्दगी
बिलकुल मेरी डायरी सी
शुरूआती पन्ने
बहुत सुन्दर
तमाम रंग..मेरे हाथों से
तो कुछ बड़ो के सहारों से
फिर
ओह्ह...बेहतरीन चटक रंग
लाल गुलाबी पीले नीले
पर सब एक साथ
शायद ज्यादा हो लिए
वरना काले नही पड़ते...
बाद के कुछ पन्ने
कटे फटे ..
मुड़े भी
उफ़ कुछ तो स्याह
एकदम सख्त ..
ये क्या...??
ये पन्ने फिर खाली
एकदम कोरे
ऐसा क्यूँ???
मैं कहाँ थी???
और कुछ पन्ने
तेरे लिए छोड़े हैं
काश कोई कह दे
कि लिख दो
या लिख दूँ??
कुछ पारदर्शी रंगों
तेरा नाम फिर से ....!!!े
मंगलवार, 28 जनवरी 2014
ये न पूछो...
कतरा जो थमा था निकलते -निकलते
चुभता है कितना ये ना पूछो
बेतरतीबी मेरी..मेरे लहजे से बयाँ होती है
है किरदार मेरा क्या ..ये ना पूछो
मेरी वफाये तेरे वजूद में कैद हैं
हैं इश्क कैसा मेरा??..ये ना पूछो
तेरा अक्स मेरे जर्रे जर्रे में बिखरा
है आईना कैसा मेरा ...ये ना पूछो