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रविवार, 16 मई 2021

क्षणिका

हां 
सच है 
देहरी पार की मैंने 
वर्जनाओं की
रुढ़िवाद की 
पाखंड की
कुंठा की ....

ओह
सभ्य समाज ....!
तुम्हारी ओर से 
सिर्फ घृणा .?

कहो
इतने नाजुक कब से हो लिए?
किसी स्त्री के प्रति...??


सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

कांच के टुकड़े

सुनो 
मेरे पास कुछ
कांच के टुकड़े हैं
पर उनमें 
प्रतिबिंब नहीं दिखता
पर कभी 
फीका महसूस हो 
तो उन्हें धूप में 
रंग देती हूं
 
चमक तीक्ष्ण हो जाते
तो दुबारा 
परतों में दफ्न 
कर देती हूं 

पर ये
निरंतरता उबाती है
कभी कहीं
शायद वो टुकड़े
गहरे पानी में डूबो आऊ

बताओ
क्या वो कांच 
तुम भी 
बनना चाहोगे ..???
  .. आशा बिष्ट

रविवार, 19 जनवरी 2020

एकल संवाद

मन तेरा 
चित्र तेरा 
मस्तिष्क तेरा 
मेरे हिस्से 
मैं ही मैं

ख्वाहिशें तेरी 
उन्माद तेरा 
जिज्ञासा तेरी 
चाहत तेरी 
मेरे हिस्से 
मैं ही मैं ..!!
@asha bisht

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

अंतिम

वो अंतिम होता क्या  है?
वेदनाएं निरंतर हैं
हर्ष निरंतर है
चाह स्थिरता की 
निरंतर है 

जिस अंतिम का 
वो प्रहार है 
आखिर वो अंतिम 
है क्या ???

प्रथम पहर में 
तुम नहीं थे 
मध्यम में भी 
तुम नहीं थे 

अब उस अंतिम में
तुम्हारा होना
व्यर्थ है ....!!!
@ Asha bisht

बुधवार, 20 मार्च 2019

Layout

पीछे मुड़कर देखूं जरा तो
जिन्दगी का भी layout
सा कुछ दिखता है

लगता है इस कोने का
उस कोने रख दिया
निकाल शोर से
सन्नाटे में छुपा लिया

ओह्ह ___देखो वहां पर जरा
चटक लाल रंग रह गया

Hmm,____ पीला मुरझाया -सा
(निश्चित थी कि सूखा न था)
पत्ता...!!
हां वही ,__
उसे भी सहेज लिया

पर वो "रिश्ते"
वाला हिस्सा
संवर रहा है अभी भी
बस जरा जरा सा .....!!!
(Asha Bisht )

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

प्रीत

मेरी
प्रीत को
छूने
की
कोशिश
ना
करना....
वो तो
देखने
भर
से
मैला
हो
जाता
है ....,

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

तुम और मैं

मैं सिर्फ
हाँ और ना
में गुम
और तुमने
अपने शब्दकोश
के सारे शब्द
उडेल दिये
बोलो___विचित्र
तुम या मैं

मैं तेरे तिलिस्म
में घुलती रही
और तुम
उलझे उलझे
खुद से ही
बोलो___ख्वाब में
तुम या मैं

जानती हूं
ना तुम थे
ना रहोगे
बोलो____सच्चा कौन
तुम या मैं ......!

शनिवार, 9 सितंबर 2017

@@

वो रिश्ता
जो नाम
के वश
में कैद...
तुमने
मोहब्बत
कह दिया
और मैनें
मान लिया

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

जिंदगी

कोई तो
सुझा दो
जिंदगी
के
चार रंग
जो दो
उसके हों
दो
मेरे.....!

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

बात

उफान ,तिलिस्म,
जिद ,अहम
सब अनवरत
फिर
धुआ ....!

मौन , बातें
हंसी ,आँसू
सब मुझसा
फिर
खत्म....!!

सांसे,सन्नाटा
शोर, खामोशी
सब तुझसा
फिर
दर्द ....!!!!

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

तुझ सा
कोई
मिले
ना
मिले......
पर
मुझे
मुझ
सा
मिल
ही
गया ........

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

kuch to bolo ..ye raat itni gahri kyu hai
kyu tu mere wajood mein itna gahra
ki hr pl mera ..tere bin kuchh nhi
dekho to sahi ...kya kuch jod liya maine
kisi ki nfrte apne liye
kisi ka wqt
bs
bewajah
tere bagair..

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

मेरा प्रश्न

कई
बार
सुना है
एक
शब्द
"संवदेनहीन"
क्या
हर
बात
का
जबाब
देकर
मैं
"संवदेनशील "
बन
जाऊगीं..???

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

मौन

हाँ...सुन लिया था
पर
प्रत्युतर मेरा
मौन

शिकायतें लाज़मी थी
पर
तर्पण मेरा
मौन

सन्नाटो को टूटना ही था
पर
अभिव्यक्ति मेरी
मौन

मुखौटे
सारे रंग लिए
पर
आवरण मेरा
मौन ...!

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

कुछ ...

मन
थोडा
उदास
है आज....
तुम कहो
तो जरा झूठ
बोल लूँ
खुद से....???

रविवार, 4 जनवरी 2015

नव वर्ष

कुछ सांचे
कुछ आकृति
कुछ यादें
दरवाजों पर
लगी सांकल सी ..!

शुभ वर्ष

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

तुझ तक

हाशिये छोड़ ..कतार के आखिर में मै
शोर और संवाद दोनों खत्म मुझतक

हर ओर भीड़..उससे निकलती हंसी
छनी छनी सिर्फ गुनगुनी मुस्कान मुझतक

बेशक आधे अधूरे हैं पर ...कभी तो
कैसे तो पहुंचे शब्द मेरे तुझ तक ...!!ं

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

कुछ पन्ने...

खूबसूरत हैं जिन्दगी
बिलकुल मेरी डायरी सी

शुरूआती  पन्ने
बहुत सुन्दर
तमाम रंग..मेरे हाथों से
तो कुछ बड़ो के सहारों से

फिर
ओह्ह...बेहतरीन चटक रंग
लाल गुलाबी पीले नीले
पर सब एक साथ
शायद ज्यादा हो लिए
वरना काले नही पड़ते...

बाद के कुछ पन्ने
कटे फटे ..
मुड़े भी
उफ़ कुछ तो स्याह
एकदम सख्त ..

ये क्या...??
ये पन्ने फिर खाली
एकदम कोरे
ऐसा क्यूँ???
मैं कहाँ थी???

और कुछ पन्ने
तेरे लिए छोड़े हैं
काश कोई कह दे
कि लिख दो
या लिख दूँ??
कुछ पारदर्शी रंगों
तेरा नाम फिर से ....!!!े

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

ये न पूछो...

कतरा जो थमा था निकलते -निकलते
चुभता है कितना ये ना पूछो

बेतरतीबी मेरी..मेरे लहजे से बयाँ होती है
है किरदार मेरा क्या ..ये ना पूछो

मेरी वफाये तेरे वजूद में कैद हैं
हैं इश्क कैसा मेरा??..ये ना पूछो

तेरा अक्स मेरे जर्रे जर्रे में बिखरा
है आईना कैसा मेरा ...ये ना पूछो