पहाड़ और नारी का
कभी सुन्दर,कभी नीरस
कभी खिला, कभी उजड़ा
कुछ सख्त मन एक समान
कितना कुछ समेटे हुए
कुछ सीमायें हैं दोनों की
समान अस्तित्व की लकीरें
हर कठोर प्रहार सह लें
हर अपनत्व को पहचान लें
पर टूटे जब दोनों
बिखर जाएँ कण-कण में
अपने से बाहर निकल आओ
थमकर,एकटक देखकर
पहचान लो जरा क्या है ये
पहाड़ और....और नारी....!

