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रविवार, 4 जनवरी 2015

नव वर्ष

कुछ सांचे
कुछ आकृति
कुछ यादें
दरवाजों पर
लगी सांकल सी ..!

शुभ वर्ष

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

तुझ तक

हाशिये छोड़ ..कतार के आखिर में मै
शोर और संवाद दोनों खत्म मुझतक

हर ओर भीड़..उससे निकलती हंसी
छनी छनी सिर्फ गुनगुनी मुस्कान मुझतक

बेशक आधे अधूरे हैं पर ...कभी तो
कैसे तो पहुंचे शब्द मेरे तुझ तक ...!!ं