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बुधवार, 2 नवंबर 2011

कुछ दर्द...अलग सा ..!

मेरे गाँव की मिट्टी 
शायद सोचती होगी ताउम्र   

क्यूँ  हूँ  मैं इस छोर पर 
जिसे अंतिम कहते हैं
छोड़ जाते है सब
सिर्फ कुछ जाते पदचिन्ह 
कर जाते है पलायन 
कभी सुख के बहाने 
कभी समृद्धि के बहाने...

ताकती रहती हूँ दिन भर
इन बंद दरवाजों को 
आहट तेरे आने की
नया जोश भर देंगी मुझमें 
न जाने बैठी हूँ कब से 
एक क्षण मुस्कुराने को ...

जाना होता है जब कभी
भूले भटके उस ओर..
गाँव की मिट्टी सुबक कर कहती है
ना..जा.. लौट कर
ना कर पलायन....!!
  

37 टिप्‍पणियां:

  1. ना जा लौट कर,ना कर पलायन सुंदर भावों के साथ लिखी रचना...सुंदर पोस्ट ..मेरे नए पोस्ट पर स्वागत है ...

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  2. बेहतरीन रचना।
    पलायन की त्रासदी पर भावुक कर देने वाली प्रस्‍तुति।

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  3. आहट तेरे आने की
    नया जोश भर देंगी मुझमें
    न जाने बैठी हूँ कब से
    एक क्षण मुस्कुराने को
    .........प्रभावित करती पंक्तियाँ ....मन को झकझोरने के लिए बहुत सुन्दर भावमयी प्रस्तुति....

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  4. बेहद गहन मगर सटीक अभिव्यक्ति।

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  5. अपनी धरती की मिटटी -हमेशा ही प्यारी होती है ! सुन्दर भावभरी कविता ! बधाई

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  6. गाँव की मिट्टी और घर की दीवारें रोक ही लेती है ...

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  7. सुन्दर रचना ज़मीन से जुड़े रहने की ख्वाहिश को कहती हुई

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  8. जाना होता है जब कभी
    भूले भटके उस ओर..
    गाँव की मिट्टी सुबक कर कहती है
    ना..जा.. लौट कर
    ना कर पलायन....!!

    हृदयस्पर्शी.....

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  9. जाना होता है जब कभी
    भूले भटके उस ओर..
    गाँव की मिट्टी सुबक कर कहती है
    ना..जा.. लौट कर
    ना कर पलायन....!!behtreen post...

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  10. कर जाते है पलायन
    कभी सुख के बहाने
    कभी समृद्धि के बहाने......
    bahut bhawpoorn.......achcha laga.

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  11. gaon ki mitti humesha dil me mahakti hai.bahut umdaa rachna.

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  12. क्यूँ हूँ मैं इस छोर पर
    जिसे अंतिम कहते हैं
    छोड़ जाते है सब
    सिर्फ कुछ जाते पदचिन्ह

    बहुत ही खूब लिखती है आप.
    आपकी कलम को शुभ कामनाएं.

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  13. माटी के मनोभावों को सार्थक अभिव्यक्ति दी है आपने.

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  14. गाँव की मिट्टी सुबक कर कहती है
    ना..जा.. लौट कर
    ना कर पलायन....!!

    बहुत सही बात कही है आपने। गाँव की मिट्टी इसलिए सुबक रही है है क्योंकि अब उसे कोई गाँव की मिट्टी रहने भी नहीं देना चाहता।

    बहुत अच्छा लगा आपका ब्लॉग।

    सादर

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  15. यथार्थपरक सोच के साथ लिखी गयी सकारात्मक भावपूर्ण रचना !

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  16. गांव की माटी से दूर होकर जाने वाला भी हरपल सोचा करता है अपनी माटी के बारे में मगर नहीं लौट पाता वह दुबारा। अपनी जड़ों से उखड़कर दूर कहीं जाकर पल्लवित होने वाला पौधा पेड़ बनने पर नहीं लौट पाता अपने गांव लेकिन याद तो करता रहता है अपनी माटी को।
    यही नियति है...क्या किया जाय!

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  17. आदरणीया आशा जी
    सस्नेहाभिवादन !

    इतनी भावप्रवण है आपकी कविता कि सीधे मन में पैठ करती है…
    गांव की मिट्टी सुबक कर कहती है
    ना..जा.. लौट कर
    ना कर पलायन....!!


    मिट्टी से जुड़ाव कभी ख़त्म हो भी नहीं पाता …


    संवेदनाओं को जाग्रत करने वाली इस रचना के लिए बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  18. जाना होता है जब कभी
    भूले भटके उस ओर..
    गाँव की मिट्टी सुबक कर कहती है
    ना..जा.. लौट कर
    ना कर पलायन....!!

    बेहद संवेदनशील विषय पर आपके विचार ह्रदय द्रवित कर गए. सुंदर प्रस्तुति.

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  19. behad bhaavpurn. gaanv ki mitti paanv rokati to hai par door jo chala gaya chala gaya. bas yaadon mein rah jat ahai sabkuchh.

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  20. बहुत खूब आप मेरी रचना भी देखे ...........

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  21. अपनी जड़ों से और उसकी माटी से जुड़े रहना ही सही जीना है।

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  22. जाना होता है जब कभी
    भूले भटके उस ओर..
    गाँव की मिट्टी सुबक कर कहती है
    ना..जा.. लौट कर
    ना कर पलायन....!!


    आशा जी बहुत ही सुन्दर रचना आज के
    पलायन करते लोगों के लिये .!
    मेरे ब्लॉग पे आपका स्वागत है !.

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  23. इस अद्भुत रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकारें...

    नीरज

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  24. आप सभी जनों ने मेरी कविता पर टिप्पणी मेरा जो प्रोत्साहन बढाया है इसके लिए सादर धन्यवाद...

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  25. पलायन की समस्या को चित्रित करती रचना, अच्छी लगी!

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  26. .... बंद दरवाजों को
    आहट तेरे आने की
    नया जोश भर देंगी मुझमें
    न जाने बैठी हूँ कब से
    एक क्षण मुस्कुराने को ...

    गाँव के दर्द को बखूबी बयां किया आपने

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  27. सुन्दर भावमयी प्रस्तुति.......

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  28. सुन्दर ..मूल भाव कोमल ..एक प्रेयसी की चाह जल्द ही मनोकामनाए पूरी हों ....
    भ्रमर ५

    ताकती रहती हूँ दिन भर
    इन बंद दरवाजों को
    आहट तेरे आने की
    नया जोश भर देंगी मुझमें
    न जाने बैठी हूँ कब से
    एक क्षण मुस्कुराने को ...

    उत्तर देंहटाएं
  29. अत्यंत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति ..मिट्टी की सिसकियाँ और दर्द समेटे
    ह्रदय स्पर्शी कब्यांजलि ...आशा जी शुभ कामनायें !!!

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  30. पहले देवसारी, फिर देवाल और अब शायद कहीं और (दून घाटी)........................ स्वयं अनुभव करने के उपरान्त मिट्टी का दर्द, एवं पलायन की मनोवृति को शब्दों में उकेरना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है।

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