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शनिवार, 12 नवंबर 2011

मैं ...


पल-पल में ढूँढू 
क्षण-क्षण में भूलूँ
आती जाती यादों को 
अवाक् सी  मैं ..


कुछ द्वंदों में झूलती
प्रतिरूप को खोजती 
पथ से पग-पग 
भ्रमित होती  मैं..

दुःख ना जानू तेरे
पीड़ा ना समझूं उसकी 
क्या है आना-जाना ,बस
निश्चेत सी मैं..   

कुछ सन्नाटों को बिखेरू
कुछ ठिठोली में गूँज जाऊं
ध्वनि- प्रतिध्वनि के  बीच 
मूक सी मैं..


ना सहेज संकू मन मस्तिष्क
ना ही संवेदनाओं का 
आदान- प्रदान 
बस क्षणिक 
निर्वात सी मैं...!!



  

32 टिप्‍पणियां:

  1. शून्य की सी स्थिति को कहती अच्छी रचना

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  2. बहुत सुन्दर रचना , बधाई.

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  3. बहुत अच्छे भाव !

    अच्छी रचना !

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  4. ना सहेज संकू मन मस्तिष्क
    ना ही संवेदनाओं का
    आदान- प्रदान
    बस क्षणिक
    निर्वात सी मैं...!!
    अतिसुन्दर बधाई की परिधि से बाहर .....

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  5. गहरी भावनाएं....
    सुंदर प्रस्‍तुतिकरण।

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  6. अच्छी भावपूर्ण रचना...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  7. आपकी इस रचना का शिल्प और भाव मन को आकर्षित करते हैं।

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  8. ना सहेज संकू मन मस्तिष्क
    ना ही संवेदनाओं का
    आदान- प्रदान
    बस क्षणिक
    निर्वात सी मैं...!! bhaut hi sundar aur sarthak bhaav....

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  9. सार्थक रचना
    बहुत सुन्दर भाव दिए है आपने

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  10. कुछ सन्नाटों को बिखेरू
    कुछ ठिठोली में गूँज जाऊं
    ध्वनि- प्रतिध्वनि के बीच
    मूक सी मैं..

    अति सुंदर, जीवन की धूप-छाँव.

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  11. सबसे पहले हमारे ब्लॉग 'खलील जिब्रान' पर आपकी टिप्पणी का तहेदिल से शुक्रिया.........आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ...........पहली ही पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब...........आज ही आपको फॉलो कर रहा हूँ ताकि आगे भी साथ बना रहे|

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  12. कुछ सन्नाटों को बिखेरू
    कुछ ठिठोली में गूँज जाऊं

    वाह!! सुन्दर रचना....
    सादर...

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  13. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है !

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  14. बेहद नाजुक अहसास को पिरोया है आपने इस कविता में... सुन्दर सी प्यारी सी रचना के लिए आभार और बधाई ।

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  15. बहुत ख़ूबसूरत रचना..बेहद नाजुक अहसास..अभिव्यंजना मे आप का स्वागत है..

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  16. अहसासों से भरी प्यारी सुंदर रचना,लाजबाब पोस्ट ...

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  17. आप सभी जनों का हार्दिक धन्यवाद ....

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  18. अपने आपको टटोलती सुंदर रचना ...

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  19. दुःख ना जानू तेरे
    पीड़ा ना समझूं उसकी
    क्या है आना-जाना ,बस
    निश्चेत सी मैं..


    आत्मविश्लेषण की तरफ ले जाती रचना ...!

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  20. आशा जी,
    सुंदर अहसासों सजी बेहतरीन रचना,
    मेरे नए पोस्ट में आइये स्वागत है..

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  21. यह तो बहुत ही अच्छी लगी।
    वैसे 'मैं' की यही नियति है। 'मैं' न रहे तो समस्या ही न रहे।

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