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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

प्रेम

 निश्छल है 
अविरल है 
अनवरत है ये
तुम्हारे लिए.

खामोश है 
स्पंदन लिए
बह जाता
धार लिए
सम्मलित है इन शब्दों में
तुम्हारे लिए..

साक्षात्कार है ये
मेरा, मेरे मन से
मौन है ये 
सुन कर तुम्हें
दर-ब-दर  बढ़ता जाता
तुम्हारे लिए..

पारितोष है मेरा
निशब्द मुस्कराहट तुम्हारी
जाने- अनजाने तैर आती है जो
सिर्फ मेरे लिए...!!

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

समय

कभी तल्ख़ सा चुभता है ये 
कभी संजोये सुमधुर ख्वाब
कभी कह जाता क्षण-क्षण 
और कभी निशब्द हो जाता है....|

थामना चाहती हूँ जब कभी
रफ़्तार उसकी बढ सी जाती है 
कभी गुजर जाने की चाह में ये
शूल सी पीड़ा दे जाता है....|

मैं हूँ बेसुध खोज में इसकी
चाहती हूँ हर पल साथ चलना
पर मुझे ही उलझा कुछ पलों में ये 
आगे बढ जाता मेरा ही चिर प्रतिद्वंदी
ये निष्ठुर समय....|| 

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

आधे अधूरे.......

[१]
हर  पल की परछाई 
आ घेर ले मुझे 
अब न कोई तमन्ना 
अब न कोई कसक
रह सका अब मेरे  मन में 
सिर्फ दर्द.......
वो भी थोडा सा...
 [२] 
कह दिया फरिश्तों से 
अब रहमो करम कम कर
इन मेहरबानियों को 
रखूं तो कहाँ रखूं... 
[३] 
हम रिश्तों के समन्दर में 
झाग बन कर रह गए
गहराइयां जब बढती गई 
शुक्र है डूबने से तो बच गए.....

शनिवार, 12 नवंबर 2011

मैं ...


पल-पल में ढूँढू 
क्षण-क्षण में भूलूँ
आती जाती यादों को 
अवाक् सी  मैं ..


कुछ द्वंदों में झूलती
प्रतिरूप को खोजती 
पथ से पग-पग 
भ्रमित होती  मैं..

दुःख ना जानू तेरे
पीड़ा ना समझूं उसकी 
क्या है आना-जाना ,बस
निश्चेत सी मैं..   

कुछ सन्नाटों को बिखेरू
कुछ ठिठोली में गूँज जाऊं
ध्वनि- प्रतिध्वनि के  बीच 
मूक सी मैं..


ना सहेज संकू मन मस्तिष्क
ना ही संवेदनाओं का 
आदान- प्रदान 
बस क्षणिक 
निर्वात सी मैं...!!



  

बुधवार, 9 नवंबर 2011

परिवर्तन

एक उलझन  है ये परिवर्तन 
न माने तेरी ,न माने मेरी 
खींच ही लेता है मनोवेगों से 
ये प्रवर भंवर सा परिवर्तन 

कभी मध्यम सा 
कभी भूचाल सा 
कभी सरसराता 
है ये अजीब सा परिवर्तन 

मैं तो चलाचल हूँ 
अपनी ही चाल में 
मुझे रौंदता सा 
आगे बढ जाता है
ये उन्मादी  सा परिवर्तन  ....!!!!  

बुधवार, 2 नवंबर 2011

कुछ दर्द...अलग सा ..!

मेरे गाँव की मिट्टी 
शायद सोचती होगी ताउम्र   

क्यूँ  हूँ  मैं इस छोर पर 
जिसे अंतिम कहते हैं
छोड़ जाते है सब
सिर्फ कुछ जाते पदचिन्ह 
कर जाते है पलायन 
कभी सुख के बहाने 
कभी समृद्धि के बहाने...

ताकती रहती हूँ दिन भर
इन बंद दरवाजों को 
आहट तेरे आने की
नया जोश भर देंगी मुझमें 
न जाने बैठी हूँ कब से 
एक क्षण मुस्कुराने को ...

जाना होता है जब कभी
भूले भटके उस ओर..
गाँव की मिट्टी सुबक कर कहती है
ना..जा.. लौट कर
ना कर पलायन....!!
  

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

क्यों कहते हो......!





 



जानती  हूँ मैं....
न मुझमें लिबास का सलीका 
न कुछ कहने  की तहजीब 
न ही समझूँ मैं मन तुम्हारे 
क्यों कहते हो पहाडिन.....?

पर फिर भी 
वो निरीह पशु-झुण्ड 
रूक जाते हैं मेरी एक धाद से 
उस  जंगल के लता  वृक्ष
खिल  उठते हैं मेरी आहट से

वो पहाड़ों  की दीवारें गूँज
उठती  हैं मेरी अनुगूंज से 
चांदनी  ही बन  जाती  है  साथी 
जब उलझ जाती  हूँ कभी 
इन सुरम्य घाटियों में

बस  मन बोल  उठता  है 
हाँ .... हूँ मै पहाडिन ....!!!
[धाद-पुकारना ]   

 


सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

शुभ दीपावली



                                                    रोशन  हो हर कोना,रोशन हो हर क्षण 
                                 समृद्धि,सौहादर्य का हो सार-विस्तार..
                                   कुछ दीये ले आओ,देखो कुछ है मेरे पास
                                     चलो दीप जला आयें द्वार-द्वार...!!!
                                                    



















शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

कशमकश ....


 मैंने अपने सुख दुःख के दो
तलों से पूछा ..
क्या  मैंने अपने से बेवफाई की 
एक ने कहा-हाँ
तुमने उस ठंडे पानी  को
गर्म राख से झुलसाया है
तूने मेरी परवाह न कर
उसको   सताया है .
उसकी झंकारों को मोड़कर 
उसके रूप को बदलाया है...

तो दुसरे तल ने कहा- नहीं 
उसने भी तेरा ख्याल न कर
जिल्लत की हर  नजर में तुझे झोंका है
सानिध्य का हर तार तोडा है 
तूने ठीक किया मेरे रूप 
तूने ठीक किया
अजीब उलझन है 
क्या किसने कहा ?
किसे अपनाऊ कही सुख के बहाने 
दुःख का अम्बार न लग जाए .......||
 


सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

VYATHA.......05january2003

 नम आँखों से कोई आगे दिखा 
तो कोई पीछे थामे हुए उसे 
पुकारने को विवश कर दे 
विवशता में दबती हुई
भावनाओं में घुटती हुई..


हर किसी को एक ही मुस्कान से 
अपना परिचय देती हुई 
बस ख़ामोशी से सहती रही 
वो पीड़ा, वो दर्द 
जो किसी को विवश कर दे 
रोने को, चीखने को,चिल्लाने को....
हर तरफ से बंधे-बंधे 
कुछ पर्वतों से घिरे उस  राह पर
जाने के लिए वो तैयार थी
पर तैयार न थे
उसके साथी,समय, हालत.... 

बस दबी जुबान से 
चुनौती देने को तैयार थी 
और समय अपनी रफ़्तार का
एक हिस्सा भी उसे न दे सका.....

मैं क्या दू उसे ,मैं स्वयं व्यस्त हूँ
जीने में अपनी परिस्थियाँ संभालने में
तुम थोडा वक्त निकालो 
साथ दो उसका
तभी जान पाओगे उसकी व्यथा....      

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

Meri pahli kavita. 02/04/2002 at Srinagar Garhwal Uttarakhand

मृत्यु  की छाया निकट है 
मोह की माया विकट  है 
मोह त्याग स्वीकार कर लो 
मनुष्य जिसे कहता है मृत्यु ..

अथक चाल भरकर तुम 
अडिग वेग  लेकर तुम 
ले चलो उस और 
मनुष्य जिधर जाने से डरता..


आत्मा की चीत्कार सुन
 स्वार्थ का ताना न बुन 
 तोड़ दे अवरोध सारे   
 बने  है जो तुम्हें सोचकर...


निज तन, निज धन के लिए
निज ज्ञान,अपमान के लिए
न विलम्ब कर क्षण भर का 
सोच कर उनका क्या होगा...


वे मुर्ख ऐसे न,जैसे तुम
वे ज्ञानी ऐसे,जैसे न तुम
करें सब कुछ समझ कर
जांचकर,और कुछ परखकर..

ये प्रण कर लो मन में
चल पड़े हम जिस ओर 
न कोई बाधक बने
न जाने,न समझे...


              वो ही है एक शांतिदायक 
               मनुष्य जिसे कहता है मृत्यु.....!!!!!

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

MERI KAVITA..

Kitani sadagi se tuta
ye nirmam darpan mera
na tutne ki aawaj hui
na koi dard hua..

par yaki hai mujhe tut chuka
har kona har parat.
bikhar kar mere sapano ke
samane bhale hi na aaya ho
par tut chuka nirmam darpan mera...............!!