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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

समय

कभी तल्ख़ सा चुभता है ये 
कभी संजोये सुमधुर ख्वाब
कभी कह जाता क्षण-क्षण 
और कभी निशब्द हो जाता है....|

थामना चाहती हूँ जब कभी
रफ़्तार उसकी बढ सी जाती है 
कभी गुजर जाने की चाह में ये
शूल सी पीड़ा दे जाता है....|

मैं हूँ बेसुध खोज में इसकी
चाहती हूँ हर पल साथ चलना
पर मुझे ही उलझा कुछ पलों में ये 
आगे बढ जाता मेरा ही चिर प्रतिद्वंदी
ये निष्ठुर समय....|| 

25 टिप्‍पणियां:

  1. समय मुड़ कर कभी पीछे नहीं देखता कि किसका हित अनहित हुआ...
    निष्ठुर तो वह है ही!

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  2. आपका पोस्ट रोचक लगा । मेरे नए पोस्ट नकेनवाद पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  3. किसी के रोके कब रुका है समय...वो तो अपनी रफ़्तार से बढ़ता ही जाता है, चाहे जो हो..

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  4. समय सच में बडा बलवान होता है.....
    सुंदर रचना।

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  5. वक़्त के साथ चलना बहुत मुश्किल होता है फिर भी कोशिश तो कर ही सकते हैं।

    सादर

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  6. आगे बढ जाता मेरा ही चिर प्रतिद्वंदी
    ये निष्ठुर समय....||
    ......सार्थक संदेश देती रचना

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  7. बेहद सुन्दर शब्दों का प्रयोग खूबसूरत कविता बधाई

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  8. वक़्त सख्त है, कमबख्त है,,,

    सुन्दर प्रस्तुति

    www.poeticprakash.com

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  9. भावपूर्ण बेहद खूबसूरत सुंदर प्रस्तुति,.....बढ़िया पोस्ट ...

    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    जहर इन्हीं का बोया है, प्रेम-भाव परिपाटी में
    घोल दिया बारूद इन्होने, हँसते गाते माटी में,
    मस्ती में बौराये नेता, चमचे लगे दलाली में
    रख छूरी जनता के,अफसर मस्ती के लाली में,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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  10. मैं हूँ बेसुध खोज में इसकी
    चाहती हूँ हर पल साथ चलना
    पर मुझे ही उलझा कुछ पलों में ये
    आगे बढ जाता मेरा ही चिर प्रतिद्वंदी ...

    ये समय सच में बहुत निष्ठुर है ... किसी के लिए नहीं रुकता ... इअके साथ साथ चलना ही पड़ता है ... अच्छे भाव हैं आपकी रचना में ...

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  11. सार्थक संदेश देती सुंदर प्रस्तुति|

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  12. पहली बार आप के ब्लॉग पर आना हुआ,अच्छा लगा यहाँ आ कर,बेहतरीन रचना है ,ये पंक्तियाँ बिशेष पसंद आईं .......पर मुझे ही उलझा कुछ पलों में ये
    आगे बढ जाता मेरा ही चिर प्रतिद्वंदी
    ये निष्ठुर समय....||...बधाई स्वीकारें....... :)

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. Khoobsurat rachna behad bhaavpurn prastuti..

    Mere blog par aane ke liye dhanyawaad.
    aise hin khoosurat rachnao se ru-ba-ru karwate rahen.


    Aabhaar...!

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  15. आप तो बहुत प्यारा लिखती हैं..बधाई. 'पाखी की दुनिया' में भी आपका स्वागत है.

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  16. आशा जी आप के ब्लांग में आकर बहुत अच्छा लगा..गहन भावमयी सार्थक संदेश देती सुन्दर रचना..मेरी नई पोस्ट मे आप का स्वागत है..

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  17. थामना चाहती हूँ जब कभी
    रफ़्तार उसकी बढ सी जाती है
    कभी गुजर जाने की चाह में ये
    शूल सी पीड़ा दे जाता है....|

    vah bahut sundar likha hai ap ne badhai.

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  18. बहुत सुन्दर आशा जी...
    बहुत अच्छी कविता.

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