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शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

क्यों कहते हो......!





 



जानती  हूँ मैं....
न मुझमें लिबास का सलीका 
न कुछ कहने  की तहजीब 
न ही समझूँ मैं मन तुम्हारे 
क्यों कहते हो पहाडिन.....?

पर फिर भी 
वो निरीह पशु-झुण्ड 
रूक जाते हैं मेरी एक धाद से 
उस  जंगल के लता  वृक्ष
खिल  उठते हैं मेरी आहट से

वो पहाड़ों  की दीवारें गूँज
उठती  हैं मेरी अनुगूंज से 
चांदनी  ही बन  जाती  है  साथी 
जब उलझ जाती  हूँ कभी 
इन सुरम्य घाटियों में

बस  मन बोल  उठता  है 
हाँ .... हूँ मै पहाडिन ....!!!
[धाद-पुकारना ]   

 


21 टिप्‍पणियां:

  1. बस मन बोल उठता है
    हाँ .... हूँ मै पहाडिन ....!!!

    आपका पहाडिन होना और भावों को बहुत सलीके से अभिव्यक्त करना ....दोनों का अंदाज निराला है ..बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  2. सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति , बधाई.

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  3. हरेक पंक्ति बहुत मर्मस्पर्शी है। कविता अच्छी लगी ।

    संजय भास्कर
    आदत....मुस्कुराने की
    पर आपका स्वागत है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  4. ....आपकी धाद न त ज्युकड़ी मा कुद्ग्याली सी लगे याली ...बहुत ..ही सुंदर अर सराहनीय....!!!

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  5. बहुत खुबसूरत, क्या बात है.......

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  6. मैं पहाडिन हूं......
    गजब की अभिव्‍यक्ति.....

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  7. बहुत खूब .
    दिल से निकली हुई सरल सी अभिव्यक्ति.
    दिल को छू गयी.

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  8. वाह!
    एक दिल की गहराई से निकली यह अभिव्यक्ति कई दिलों को छू जायेगी।
    ..बहुत बधाई।

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  9. धाध जैसे क्षेत्रीय शब्द का उपयोग प्रभावशाली ढंग से किया गया है

    आपकी पोस्ट सराहनीय है शुभकामनाऐं!!

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  10. मन कि भावनाओं को बखूबी उकेरा है

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  11. अति उत्तम |सुन्दर चित्र अच्छी रचना |
    आशा

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  12. सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति ......

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  13. कल 06/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  14. वाह! बहुत सुन्दर... सुन्दर रचना....
    सादर बधाई...

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  15. बहुत ही बड़िया रचना और फोटोग्राफ।
    मुझे भी गर्व है कि मैँ पहाड़ी हूँ॥

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