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शुक्रवार, 4 मई 2012

...???

स्वयं से जोड़ा 
कुछ कुरेदा, कुछ तराशा 
फिर बदली है क्यूँ?
मेरी ही अनुकृति 

संशय है 
पथ ये तो ना था 
राह बदली है..?
या बदली  
मेरी ही प्रकृति 

अबोला समझ लिया 
शब्दश: ...........पर 
न स्वीकार सकी 
मौन स्वीकृति 

स्तब्धता लिए 
निशब्द हूँ 
क्यूँ ...?
निरंतर बदलती है 
तुम्हारी प्रवृति ...!!!

26 टिप्‍पणियां:

  1. आप सभी से अनुरोध है कृपया शीर्षक सुझा दे....क्योकि विभिन्न शब्द तो मिल गए किन्तु उनका सार ना मिल सका...

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  2. बहुत सुंदर भाव आशा जी....

    संशय है
    पथ ये तो ना था
    राह बदली है..?
    या बदली
    मेरी ही प्रकृति

    बहुत खूब....

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  3. स्तब्धता लिए निशब्द हूँ
    क्योंकि मैं तो नहीं बदली,
    निरंतर बदलती है
    तुम्हारी प्रवृति ...!
    उम्दा प्रस्तुति ... आभार

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  4. बहुत सुंदर सार्थक भावअभिव्यक्ति // बेहतरीन रचना आशा जी //

    WELCOME TO MY RECENT POST ....काव्यान्जलि ....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

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  5. अबोला समझ लिया
    शब्दश: ...........पर
    न स्वीकार सकी
    मौन स्वीकृति

    बेहतर रचना ...!

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  6. अंतर-मन से बतकही, होती रहती मौन ।

    सिंहावलोकन कर सके, हो अतीत न गौण ।

    हो अतीत न गौण, जांच करते नित रहिये ।

    चले सदा सद्मार्ग, निरंतर बढ़ते रहिये ।

    परखो हर बदलाव, मुहब्बत अपनेपन से ।

    रहे अबाध बहाव, प्रेम-सर अंतर्मन से |

    dineshkidillagi.blogspot.com

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  7. ''कुछ बदला बदला सा ......''
    यही शीर्षक समझ आया ....!!
    सुंदर रचना ....

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  8. अच्छी प्रस्तुति.
    गहन भाव प्रेषित करती.

    शीर्षक 'बदलते परिदृश्य'

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईएगा,आशा जी.

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  9. बेहतरीन प्रस्तुति .आभार !

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  10. वक़्त के साथ बहुत कुछ बदलता है ...अच्छी प्रस्तुति

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  11. तुम भी कुछ भूल गए हमको
    हम भी कुछ थके , इरादों में
    फिर भी तेरी इस नगरी में,
    हँसते हँसते ,दुःख भूल गए !
    गहरे कष्टों में साथ रहे , जो हाथ इबादत में उठते !
    मेरे निंदिया के मालिक ये ,बस यही कहानी जीवन की !

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  12. संशय है
    पथ ये तो ना था
    राह बदली है..?
    या बदली
    मेरी ही प्रकृति ...

    समय के साथ साथ प्रवृति बदल जाती है और इसका आभास भी नहीं होता कभी कभी तो ... अच्छी रचना है ...

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  13. बहुत अच्छी रचना...बधाई...

    नीरज

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  14. सुंदर रचना...प्रवृति कब बदल जाती है पता ही नहीं चलता...
    शीर्षक...उहापोह:)

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  15. स्तब्धता लिए
    निशब्द हूँ
    क्यूँ ...?
    निरंतर बदलती है
    तुम्हारी प्रवृति ...!!!बहुत ही गहरे भावो की अभिवयक्ति......

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  16. vastav me yah saty hai ki prviti yaani svabhav
    kab kis mod par aakar badal jaati pata hi nahi chalta
    poonam

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  17. आपने बहुत ही खूबसूरत अंदाज में इसे पेश किया है । मेरे पोस्ट पर आपका आमंत्रण है । धन्यवाद ।

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  18. आशा जी मुझे लगता है कि इसका शीर्षक "रूपांतरण" होना चाहिये.

    आपकी कविता के भाव बहुत सुंदर हैं. मुझे तो बहुत सुंदर लगी आपकी यह अभिव्यक्ति.

    बधाई.

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  19. स्तब्धता लिए
    निशब्द हूँ
    क्यूँ ...?
    निरंतर बदलती है
    तुम्हारी प्रवृति ...!!bahut khoobsurti se likhi hain......

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  20. बहुत खुबसूरत रचना.. आशा..सस्नेह..

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  21. प्रभावशाली रचना है
    ध्यान आकर्षित करने में समर्थ !

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  22. स्तब्धता लिए
    निशब्द हूँ
    क्यूँ ...?
    निरंतर बदलती है
    तुम्हारी प्रवृति ...!!!

    ध्यान आकर्षित करती सुंदर प्रस्तुति,..

    my recent post....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

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  23. बहुत सुन्दर .....समय के साथ सब कुछ बदलता जाता है......बदलाव या परिवर्तन शीर्षक हो सकता है|

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  24. बहुत सुंदर । मेरे नए पोस्ट अमीर खुसरो पर आपकी प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

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  25. क्या कहूँ , काफी अच्छा लगा पढ़कर ...
    शीर्षक तो आप खुद ज्यादा अच्छा सोच सकती हैं
    मेरे ख्याल से "अबोध प्रवृति"...

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