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सोमवार, 27 अगस्त 2012

एक पेज ...

तेरी  वफाओं के चर्चे किये जब 
देर दिन तक दिया जलता रहा ..

कुछ अश्क बहे,कुछ ठहाके उठे 
देख हंसी उनकी, दिल मुस्कुराता रहा..

ये लौ क्यूँ चिराग की हंसती है मुझपर?
जबकि जिस्म उसका पिघलता रहा।.

खाक मिलाती रही तेरी बेवफाई को मैं 
तेरी चंद वफाओं पर मुझे फख्र होता रहा ...!!!

29 टिप्‍पणियां:

  1. तेरी वफाओं के चर्चे किये जब
    देर दिन तक दिया जलता रहा .बहुत अच्छे मिजाज़ की रचना है -उजले उजले फूल खिले थे ,जैसे तुम बातें करती हो ...ये लौ क्यों चिराग की हंसती है मुझपर, जबकि जिस्म उसका ,पिघलता रहा बहुत बढ़िया प्रयोग हैं इस रचना में ,बधाई ..., बधाई .वीरू भाई ,कैंटन ,मिशगन .


    मंगलवार, 28 अगस्त 2012
    आजमाए हुए रसोई घर के नुसखे
    Hip ,Sacroiliac Leg Problems
    Hip ,Sacroiliac Leg Problems(हिन्दुस्तानी जबान में भी आ रहा है यह मह्त्वपूर्ण आलेख ,विषय की गभीरता और थोड़ी सी

    क्लिष्टता को देख कर लगा पहले एक बेकग्राउंडर आधारीय आलेख अंग्रेजी में दिया जाए ताकी विषय की एक झलक तो मिल जाए वायदा है समझाया जाएगा यह आलेख हिंदी में ,अभी इस श्रृंखला के तीन -चार आलेख और आने हैं ,अब तक जो इस अभिनव विषय पर आप लोगों का रेस्पोंस मिला है उससे हौसला बढ़ा है ).
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

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  2. ये लौ क्यूँ चिराग की हंसती है मुझपर?
    जबकि जिस्म उसका पिघलता रहा।.....बहुत सुन्दर भाव बेहतरीन पंक्तियाँ..

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  3. खाक मिलाती रही तेरी बेवफाई को मैं
    तेरी चंद वफाओं पर मुझे फख्र होता रहा ...

    आसान नहीं होता ऐसा कर पाना ... बेवफाई भुला के वफ़ा पे फख्र करना ...
    लाजवाब बोल हैं सभी ... बधाई ...

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  4. तेरी वफाओं के चर्चे किये जब
    देर दिन तक दिया जलता रहा ..
    एक रंग आता रहा ,और दूसरा जाता रहा ...बहुत बढ़िया पोस्ट कृपया स्पैम बोक्स भी देखें वहां कई टिप्पणियाँ और भी मिलेंगी ,ऊपर वाली टिपण्णी गलती से आपके ब्लॉग पे आ गई है ,खेद प्रगट करता हूँ .
    मंगलवार, 28 अगस्त 2012
    Hip ,Sacroiliac Leg Problems
    Hip ,Sacroiliac Leg Problems

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  5. बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
    बधाई

    इंडिया दर्पण
    पर भी पधारेँ।

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  6. प्रयोग अच्छा है. और कविता (इसे ग़ज़ल कहना जल्दबाजी होगी) भी अच्छी व भावपूर्ण है. आभार !

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  7. खाक मिलाती रही तेरी बेवफाई को मैं
    तेरी चंद वफाओं पर मुझे फख्र होता रहा ...!
    यही वो फ़ख़्र है जो जीने का संबल बनता है।

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  8. लाजवाब रचना,,गहन अर्थ लिए हुए अतिसुन्दर कृति |

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  9. खाक मिलाती रही तेरी बेवफाई को मैं
    तेरी चंद वफाओं पर मुझे फख्र होता रहा ..

    वाह!!!!बहुत सुन्दर भाव बेहतरीन पंक्तियाँ..
    पोस्ट पर आने के लिए आभार,,,,,,,

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  10. बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ

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  11. ये लौ क्यूँ चिराग की हंसती है मुझपर?
    जबकि जिस्म उसका पिघलता रहा।

    वाह ... बहुत खूब।

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  12. खूबसूरत प्रस्तुति ...


    आशा जी ...मेरे ब्लॉगपर आने का और कविता पढ़ कर अपने विचार देने का आभार

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  13. वाह बेहद सुन्दर ग़ज़ल क्या बात है
    (अरुन=arunsblog.in)

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  14. ये लौ क्यूँ चिराग की हंसती है मुझपर?
    जबकि जिस्म उसका पिघलता रहा।... shayad isliye ki jalte hum gaye !

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    उत्तर
    1. आपकी उपस्थिति मात्र ही उद्वेलित मन को पूर्ण विराम देती है ...आभार

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  15. खाक मिलाती रही तेरी बेवफाई को मैं
    तेरी चंद वफाओं पर मुझे फख्र होता रहा ...!!!

    ...ऐसा ही होता है मोहब्बत में ...सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  16. ये लौ क्यूँ चिराग की हंसती है मुझपर?
    जबकि जिस्म उसका पिघलता रहा।.

    खूब कहा .....

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  17. ये लौ क्यूँ चिराग की हंसती है मुझपर?
    जबकि जिस्म उसका पिघलता रहा।.

    खाक मिलाती रही तेरी बेवफाई को मैं
    तेरी चंद वफाओं पर मुझे फख्र होता रहा ..
    wah bahut sundar gajal likhi hai ap ne badhai ke sath sadar abhar asha ji han ak sher mujhe apna yad aa gya bs likh dene ki echha ho gyee इस जहाँ में आग को भी फख्र हो जाता है तब.|
    हस के परवाना कोई बेफिक्र होजलता है जब||
    ये शहर है आशिको का सोच के चलना जरा |
    शोलो की दहशत से देखो वो भला डरता है कब ?

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  18. आपके पोस्ट पर आना सार्थक हुआ। रचना काफी अच्छी लगी ।धन्यवाद।

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  19. खाक मिलाती रही तेरी बेवफाई को मैं
    तेरी चंद वफाओं पर मुझे फख्र होता रहा ...!!!

    wah kya kahne hain... bahut pyari...

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  20. बहुत सुन्दर प्रस्तुति , बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग "प्रेम सरोवर" पर पधारकर मुझे प्रोत्साहित करें। धन्यवाद ।

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  21. वाह !!बेहतरीन रचना
    खाक मिलाती रही तेरी बेवफाई को मैं
    तेरी चंद वफाओं पर मुझे फख्र होता रहा ...!!!

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  22. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना |
    आशा

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  23. .


    ये लौ क्यूँ चिराग की हंसती है मुझ पर?
    जबकि जिस्म उसका पिघलता रहा।

    वाऽऽह…

    सुंदर काव्य-प्रयास है आदरणीया आशा बिष्ट जी

    आपकी लेखनी से उत्तरोतर श्रेष्ठ सृजन होता रहे … यही कामना है !
    शुभकामनाओं सहित…

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  24. ये लौ क्यूँ चिराग की हंसती है मुझपर?
    जबकि जिस्म उसका पिघलता रहा।.
    ,,,,,,,,,,,,,खूबसूरत प्रस्तुति ...आशा जी

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