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गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

:)

कुछ जला बुझा फिर से मेरे भीतर
सुर्ख हुआ... पर खाक ना हुआ..!!!

21 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ प्रश्न यहाँ हिलते हैं पत्तों से ...

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  2. आज की ब्लॉग बुलेटिन क्यों 'ठीक है' न !? - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. टीसती प्रस्तुति ...पर एफ्फेक्टिव

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  4. भीतक का, कुछ जलता रहे तो आशा बनी रहती है ...
    दमदार ....

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  5. बढ़िया बिम्ब रूप और भाव अर्थपूर्ण व्यंजना .

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  6. गहन अनुभूतियों को सहजता से
    व्यक्त किया है आपने अपनी रचना में
    बधाई

    आग्रह है मेरे ब्लॉग jyoti-khare.blogspotin
    में भी सम्मलित हों ख़ुशी होगी

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  7. खाक न होना इंसान के जीवट और हौसले को अभिव्यक्त करता है। इंसान हजारों भले-बुरे प्रसंगों से गुजरता है वहां हारना नहीं और न ही राख होना। आशा जी आपकी केवल दो पंक्तिया मानो लाखों टन कोयले के भीतर से हीरे को खोजने जैसा है। अति सुंदर।
    drvtshinde.biogspot.com

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    2. प्रत्युतर स्वरूप कुछ लिखा कुछ मिटाया पता नही चला। पर मैं समझता कविता की तरह आशा जी आपके मन में न॓वीन काव्य पंक्तियां उमड रही होंगी। लिखते रहें।
      drvtshinde.biogspot.com

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  8. नवरात्रि और नवसंवत्सर की अनेकानेक शुभकामनाएँ.

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