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शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

हल्की सी सिहरन लिए
जी उठता है जब कोई ख्वाब
कुछ कर्कश सा क्या..
सुनाई देता है हर और
और फिर....
छा जाता  है नितांत
गुमसुम सा 
बोलता सन्नाटा....!

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर....
    नए ब्लॉग www.mranazad.blogspot.com मे स्वागत है आपका !!!!!

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  2. कम शब्दों में अधिकाधिक अभिव्यक्त करने की शैली. अति सुन्दर.

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  3. सुन्दर अभिव्यक्ति
    सुन्दर विचार गहरे भाव

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  4. बोलता सन्नाटा....गहरे भाव!.....बसंत पंचमी की शुभकमनाएं

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  5. हकीकत में आपकी कवितायेँ 'जैसे पत्थर फैक दे - कोई भरे तालाब में' चरितार्थ करती है. अति सुन्दर.

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  6. आपकी पंक्तियाँ गूंजता-सा सन्नाटा है! अच्छी लगी, सधन्यवाद!

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