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रविवार, 29 जनवरी 2012

इस बहाने

आज उत्तराखंड में चुनावी दिन है.और पलायन यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है .इसी बहाने ना जाने मेरे मन में ये पंक्तियाँ आ रही हैं जिन्हें मैं आपके साथ साझा कर रही हूँ ....


''इस चौखट पर हलचल होगी
ये दरवाजे चरमराएंगे आज
क्यूँ मन मेरा खुश होता है 
कि तुम आओगे इस बार..

मैं तो पदचिन्ह पर ही 
पैर रख पाती हूँ
उस गिने चुने रास्ते पर 
ही धीमे धीमे चला करती हूँ..

ये घास उखड़ेगी आँगन की
ये ताले खुलेंगे मन के
गाँव में त्यौहार होगा शायद
इस बार वोट के बहाने..

पर ना तीज त्यौहार
ना लोकतंत्र के बस की 
लाख कोशिशें हो जाए पर
ना बदल सका मन तुम्हारा..!! 




 




26 टिप्‍पणियां:

  1. चुनावों का मौसम है ..बढ़िया प्रस्तुति

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  2. आशा है उत्तराखंड प्रगति की राह पर बढ़ चले.
    घुघूतीबासूती

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  3. मुझे पूरी उम्मीद है कि आपने अपना वोट ज़रूर दिया होगा।
    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने।

    सादर

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  4. उत्तराखंड की प्रगति की प्रतीक्षा में हम भी हैं..सुन्दर प्रस्तुति..

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  5. बहुत सुन्दर सृजन , बधाई.


    कृपया मेरे ब्लॉग "meri kavitayen" पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा /

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  7. ये घास उखड़ेगी आँगन की
    ये ताले खुलेंगे मन के
    गाँव में त्यौहार होगा शायद
    इस बार वोट के बहाने..चुनावी पोस्ट , पर मन से निकले एहसास

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  8. मैं तो पदचिन्ह पर ही
    पैर रख पाती हूँ
    उस गिने चुने रास्ते पर
    ही धीमे धीमे चला करती हूँ..

    वाह...बेहतरीन रचना...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  9. कम शब्दों में अधिक अभिव्यक्त करने की आपकी चिर-परिचित शैली में यह कविता भी बहुत कुछ कह जाती है..... कविता कुछ विस्तार मांगती थी वैसे. शायद. ..... प्रस्तुति के लिए आभार.

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  10. बहुत सुन्दर रचना,सुन्दर भावाभिव्यक्ति.

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  11. समयानुकूल सार्थक अभिव्यक्ति......सराहनीय......
    कृपया इसे भी पढ़े
    नेता,कुत्ता और वेश्या

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  12. सुन्दर और सार्थक रचना..
    शुभकामनाएँ.

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  13. हमारी कामना है उत्तराखंड 'देवभूमि' बना रहे उतना ही सुन्दर पुण्यमय !

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  14. बेहतरीन सृजन ,,,
    शुभकामनाए

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  15. ये घास उखड़ेगी आँगन की
    ये ताले खुलेंगे मन के
    गाँव में त्यौहार होगा शायद
    वाह !!!! अव्यक्त दंश पीड़ा और बेहतरी की कामना का गूढ़ शब्द चित्र.

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  16. ये घास उखड़ेगी आँगन की
    ये ताले खुलेंगे मन के
    गाँव में त्यौहार होगा शायद
    इस बार वोट के बहाने..

    शयद ऐसा कुछ हो. सुंदर कामना और शायद सभी की. इस सुंदर प्रस्तुति के लिये बधाई आशा जी.

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    1. आपने बुलाया और मै हाज़िर! वह! बड़ा मज़ा आ गया! बहुत सुन्दर,सादगीपूर्ण लिखती हैं आप!
      Comment box na khulne ke karan mai reply me comment likh rahee hun...kshama karen!

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