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मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

प्रश्न

घुटन तो होती है 
दफन होने  में
पर परत-परत दफन होना...?

आखिर क्यूँ ना मिलती
मेरे मन की परिभाषाएं 
तुम्हारे मन से...??

और क्यूँ हर
बात के बाद
एक संतुलित 
मानसिक  अंत...??? 
    

22 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक सृजन, आभार.

    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" की नयी पोस्ट पर भी पधारें

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  2. बहुत बढ़िया रचना,सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

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  3. घुटन तो होती है .... पर हर बार बातों की परतों में एक अंत होता है, कभी सामान्य कभी असामान्य

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  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..आशा..बधाई

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  5. सुन्दर जज्बातोँ से भरी सुन्दर कविता।

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  6. बहुत गहन भाव............
    एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर शायद हम कभी नहीं जान पाते.....

    अनु

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  7. बहुत सार्थक रचना ... बधाई स्वीकार करें ...

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  8. बहुत ही सुंदर गहन भाव अभिव्यक्ति ....

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  9. अत्यंत संवेदनशील एवं भावपूर्ण रचना............बधाई स्वीकारें !!!!

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  10. और क्यूँ हर
    बात के बाद
    एक संतुलित
    मानसिक अंत...??? santulit mansik aant bahut jaruri hai ...bahut acchi rachana....

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  11. और क्यूँ हर
    बात के बाद
    एक संतुलित
    मानसिक अंत...???
    ....बहुत घुटन भरा होता है यह माहौल .....एक आर्तनाद है इस कविता में ..बहुत सुन्दर आशाजी

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  12. और क्यूँ हर
    बात के बाद
    एक संतुलित
    मानसिक अंत...???

    ऐसे प्रश्न जो मन में उठें, जवाब कहाँ से मिले इस घुटन का. जिंदगी यही है. बहुत अच्छी रचना, बधाई.

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  13. भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  14. मन का मन से मिलन प्रेम की धार पे चल के होता है ...
    इस प्रश्न का जवाब प्रेम में ही छिपा है ...

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  15. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से शुभकामनाएँ।

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