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सोमवार, 7 जनवरी 2013

हमारे हिस्से की मौते ...

न जाने कितनी मौते
रह रह कर हमारे हिस्से आती हैं
कुछ वजूद से बतियाती
तो कुछ बेझिझक- बेरोकटोक

बनाने वाले ने फर्क न  किया
कराह -दर्द माँ को एक सा दिया 
फिर क्यूँ ???हमारे हिस्से
ऐसी मौते
 और  वो तीसरे महीने की मौ ..त ...

9 टिप्‍पणियां:

  1. जब हम अपनी माँ, बहन और बेटियों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते तो शर्मसार और लज्जित होना ही पड़ेगा

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  2. सच सार दर्द औरत की ही नसीब में है ...
    मार्मिक प्रस्तुति

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  3. क्या कहूँ.....
    पीड़ा बढ़ गयी...

    अनु

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  4. पता नही क्यों समाज ने सारा दर्द औरतो के नाम कर दिया,जन्म से लेकर मृत्यु तक दर्द ही दर्द सहती रहती है,,,,

    recent post: वह सुनयना थी,

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  5. ये कैसा दर्द है जो खत्म ही नही होता..?

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  6. ak maha pap jise hm ap kr rhe hain ......chintan es pr hona chahiye ki ye asmanta ki khai kaise km ho jis se kanya bhroon hatya ko roka ja ske ......apki rachana behad prabhavshali hai ..antar mn ko chho gyee ..

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  7. मार्मिक ... क्षोभ सा भर जाता मन में ... ये दर्द क्यों ... नारी को ही क्यों सहना होता है ये सब ...

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