ये पंक्तिया काफी प्रभावित करती है ....
शब्द ने शब्द जोड़े.. शब्द से शब्द बिखरे.. शब्द -शब्द ने ढूंढें अक्षर.. शब्द- शब्द फिर, शब्दश: खामोश हुए..!
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मंगलवार, 17 दिसंबर 2013
शुक्रवार, 29 नवंबर 2013
शब्द..
बीती शाम जलते दीयों से पूछा
जलोगे तुम...बुझोगे तुम...
फिर क्यूँ ये सब??
वो मुस्कुराये फिर बोले
थमना ...तुम क्या जानो
जल कर बुझना
तुम क्या जानो...!!
शनिवार, 5 अक्टूबर 2013
शब्द
स्याह
सफेद
कागज़
मेरे
ना
जान
सके
थमने की वजहें.....
तेरी थाह
मुझसे कह
गयी
ना
मि ला
अब तक
तुझसा
अजनबी...!
गुरुवार, 8 अगस्त 2013
ईद मुबारक
बड़ा अजीब
मेरे इश्क
का हिसाब...
सदियाँ
जमाने को
मुझे कल
की बात...!!
ब्लॉग परिवार को मेरी तरफ से "ईद मुबारक"
रविवार, 14 जुलाई 2013
मैं और मेरा उत्तराखंड
उत्तराखंड की त्रासदी किसी से छुपी नहीं है कुछ भी बोलना मुझे स्वयं को भी सहन नहीं होगा।
इस दैवीय आपदा पर कुछ पंक्तिबद्ध करना मेरी आपनी मौत पर जश्न मनाने समान होगा। अभी भी जहाँ मैं रहती हूँ यहाँ अखबार नहीं आया बिना रास्तेे पुल के विद्यालय बंद है।बुनयादी सुविधाए न के बराबर... इंटरनेट है क्यों कि ये बुनियादी सुविधा में नही आता..और हां इतनी ख़ामोशी हैं की खुद की आवाज भी चुभ जाती हैं... और सबसे अजीब बात केदारनाथ में प्रलय की बात 20जून को पता चलीं
क्यों कि उस विपदा में संपर्क खुद तक ही रह पाया।
अंत में यही कहना है कि श्री केदार धाम ने अपने ही पर्याय वाची शब्द को चरितार्थ किया हैं वो है "जलीय" या "दलदल"
बस यही कहूँगी....
""क्या कुछ बिखरा टूटा
इन पहाड़ो से पूछो
ये आवाज ना दें
तो हम पहाडियों से पूछो""
बुधवार, 5 जून 2013
मैं ही क्यूँ?
कभी उनींदी
कभी जागती
उन ख्वाबो के
सिरहाने में
मैं ही क्यूँ...
कुछ बदलता
कुछ ठहरता
इन मौसमों की
ठिठुरन में
मैं ही क्यूँ..?
शुक्रवार, 24 मई 2013
सोमवार, 6 मई 2013
प्यार
प्यार क्या है?
मालूम नहीं
कभी मिला?
....?!?!?
हां... पर कभी कभी
हथेली पर कटी सी
रेखा दिखती हैं
क्या वो प्यार है??
या फिर निकल आता है
जो एक कतरा
बगैर इजाजत
या फिर ये प्यार है???ै
गुरुवार, 18 अप्रैल 2013
:):)
याद है अब तक
वो बचपन में पूजा जाना
वो पैर धुलना
माथे पर टीका चुनर
इस घर से उस घर
अपने सिक्के सँभालते
मन थमते नही थमता था
कितना अजीब है
अर्थ समझ आते गए
उम्र के साथ साथ
और ह्रदय गहराता गया ....!!!